Description
What is Purusha Sookta?
Purusha Sookta is a highly sacred and philosophical hymn from the Rigveda (Mandala 10, Sukta 90). It is one of the most important hymns in Vedic literature and is considered a cosmic vision of the universe. The Purusha Sookta describes the nature of the Supreme Being (called Purusha), the creation of the universe, and the origin of all beings and social order.
→ The word Purusha here refers to the Supreme Cosmic Being — the Universal Soul or Paramatma — who pervades everything in the universe.
Main Description of Purusha Sookta:
-
Purusha is described as a cosmic being with infinite dimensions:
-
“Sahasraśīrṣā Puruṣaḥ, Sahasrākṣaḥ Sahasrapāt”
→ Meaning: The Purusha has a thousand heads, a thousand eyes, and a thousand feet, symbolizing infinity and omnipresence.
-
Purusha is beyond time and space, existing everywhere, inside and outside all things.
-
Creation of the Universe:
-
From the sacrifice (Yajna) of this Purusha, the entire universe was created.
-
From his mind came the Moon, from his eyes the Sun, from his breath the Air, and from his navel the Sky.
-
Origin of the Four Varnas (Social Classes):
According to Purusha Sookta, the four Varnas of society emerged from different parts of Purusha’s cosmic body:
-
Mouth — Brahmins (Priests & Scholars)
-
Arms — Kshatriyas (Warriors & Rulers)
-
Thighs — Vaishyas (Merchants & Traders)
-
Feet — Shudras (Workers & Servants)
-
The whole world — living and non-living — is a manifestation of that one Purusha.
-
Unity of all existence.
-
The interconnectedness of all beings.
-
The cosmic sacrifice as a creative process.
-
The divine origin of natural elements and social structure.
-
The idea that divinity resides in everything.
Conclusion:
Purusha Sookta presents a grand vision of the universe as an expression of one Supreme Cosmic Being. It teaches that the entire creation — including humans, nature, and cosmic forces — are part of the same divine reality. It beautifully blends spiritual philosophy with the concept of unity in diversity
पुरुष सूक्त (Purusha Sookta) का वर्णन – हिंदी में
पुरुष सूक्त ऋग्वेद का एक अत्यंत प्रसिद्ध सूक्त है, जो ऋग्वेद के दसवें मंडल (मंडल 10, सूक्त 90) में आता है। इसे वेदों का एक गूढ़ और रहस्यमय स्तुति सूक्त माना जाता है। इसमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति, सृष्टि की रचना और समाज की संरचना का विस्तार से वर्णन किया गया है।
पुरुष सूक्त का मुख्य विषय:
पुरुष सूक्त में “पुरुष” शब्द का तात्पर्य एक परमात्मा या विराट पुरुष से है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का कारण है। यह पुरुष ही सृष्टि का आधार है और उससे ही सम्पूर्ण संसार की रचना हुई है।
पुरुष सूक्त का वर्णन:
-
इस सूक्त में विराट पुरुष को हजारों सिर, हजारों नेत्र और हजारों पैरों वाला बताया गया है।
“सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।”
-
यह विराट पुरुष सम्पूर्ण धरती और आकाश में व्याप्त है।
वह समय और स्थान से परे है।
-
इसी पुरुष के यज्ञ (बलिदान) से सम्पूर्ण सृष्टि की रचना हुई —
चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, जल, पशु, पक्षी, वृक्ष आदि सभी उसी पुरुष से उत्पन्न हुए।
-
समाज की चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) भी उसी पुरुष के अंगों से उत्पन्न बताए गए हैं —
-
मुख से ब्राह्मण
-
भुजाओं से क्षत्रिय
-
जंघाओं से वैश्य
-
पैरों से शूद्र
-
पुरुष सूक्त यह सन्देश भी देता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक ही ईश्वर से उत्पन्न है, अतः सभी प्राणी आपस में जुड़े हुए हैं।
पुरुष सूक्त का भावार्थ:
-
सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक ही चेतना या परमात्मा की अभिव्यक्ति है।
-
समाज की व्यवस्था का उद्देश्य सहयोग और समरसता है।
-
सब कुछ ईश्वर से उत्पन्न है और अंततः उसी में विलीन हो जाता है।
निष्कर्ष:
पुरुष सूक्त वेदों की गहराई और अद्भुत कल्पना का उदाहरण है। यह सूक्त सृष्टि रहस्य, ईश्वर की व्यापकता, समाज की संरचना और विश्व बंधुत्व की भावना को दर्शाता है।
Reviews
There are no reviews yet.