सहज साधना/ Sahaj Sadhana

20.00

सहज साधना  स्वामी रामसुखदास जी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रेरणादायक ग्रंथ है, जो साधकों को आत्म-साक्षात्कार और भगवत्प्राप्ति के सरल, सहज और व्यावहारिक मार्ग प्रदान करता है। इस पुस्तक में स्वामी जी ने बताया है कि कैसे साधक बिना जटिल विधियों के, अपने दैनिक जीवन में ही साधना को आत्मसात कर सकते हैं।

स्वामी जी के अनुसार, संसार के भोगों और कर्मों में आसक्ति ही दुःख का मूल कारण है। जब मनुष्य इनसे विरक्त होकर समत्व की स्थिति में स्थित होता है, तभी वह योगारूढ़ कहलाता है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए स्वामी जी ने तीन प्रमुख मार्ग बताए हैं

  • कर्मयोग: सभी क्रियाओं को निःस्वार्थ भाव से, केवल दूसरों के हित के लिए करना।

  • ज्ञानयोग: यह समझना कि सभी क्रियाएँ प्रकृति के गुणों के अनुसार होती हैं, और आत्मा अक्रिय है।

  • भक्तियोग: सभी क्रियाओं को भगवान की प्रसन्नता के लिए समर्पित करना                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    इन मार्गों का अनुसरण करके साधक संयोग की रुचि को समाप्त कर सकता है, जिससे उसे नित्ययोग की प्राप्ति होती है। स्वामी जी ने यह भी स्पष्ट किया है कि संसार का वियोग स्वाभाविक और अनिवार्य है, जबकि परमात्मा का योग सदा प्राप्त है। इसलिए, साधक को केवल संयोग की इच्छा का त्याग करना है, जिससे वह सहज रूप से परमात्मा में स्थित हो सकता है

Description

सहज साधना  स्वामी रामसुखदास जी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रेरणादायक ग्रंथ है, जो साधकों को आत्म-साक्षात्कार और भगवत्प्राप्ति के सरल, सहज और व्यावहारिक मार्ग प्रदान करता है। इस पुस्तक में स्वामी जी ने बताया है कि कैसे साधक बिना जटिल विधियों के, अपने दैनिक जीवन में ही साधना को आत्मसात कर सकते हैं।

स्वामी जी के अनुसार, संसार के भोगों और कर्मों में आसक्ति ही दुःख का मूल कारण है। जब मनुष्य इनसे विरक्त होकर समत्व की स्थिति में स्थित होता है, तभी वह योगारूढ़ कहलाता है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए स्वामी जी ने तीन प्रमुख मार्ग बताए हैं

  • कर्मयोग: सभी क्रियाओं को निःस्वार्थ भाव से, केवल दूसरों के हित के लिए करना।

  • ज्ञानयोग: यह समझना कि सभी क्रियाएँ प्रकृति के गुणों के अनुसार होती हैं, और आत्मा अक्रिय है।

  • भक्तियोग: सभी क्रियाओं को भगवान की प्रसन्नता के लिए समर्पित करना                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    इन मार्गों का अनुसरण करके साधक संयोग की रुचि को समाप्त कर सकता है, जिससे उसे नित्ययोग की प्राप्ति होती है। स्वामी जी ने यह भी स्पष्ट किया है कि संसार का वियोग स्वाभाविक और अनिवार्य है, जबकि परमात्मा का योग सदा प्राप्त है। इसलिए, साधक को केवल संयोग की इच्छा का त्याग करना है, जिससे वह सहज रूप से परमात्मा में स्थित हो सकता है

Additional information

Weight 0.3 g

Reviews

There are no reviews yet.

Only logged in customers who have purchased this product may leave a review.

Related products